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| at sarkithouse gorakhpur |
चुपके चुपके रात दिन क्रिकेट को जीना याद है,
हम को अब तक बचपने का वो ज़माना याद है..
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| at noukabihar gorakhpur |
वो तेरा पहली पहर सबको जगाना,
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| at noukabihar gorakhpur |
और मेरा घर पे कहा हर एक बहाना याद है..
खाली मैदान देख कर वो कुछ बेबाक हो जाना मेरा,
वो किसी भी लड़की को मुड़कर ना देखना याद हैं.....
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| at noukabihar gorakhpur |
कंपकपाती ठंड और लेदर की खुशबू ,
आज तक मैदान मे बीता हर एक रविवार याद है....
दीवारे फाँद के खलेते थे जिस जगह,
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| at sarkithouse gorakhpur |
गीली कर लेना वो मेरा किर्मिच का कपड़ा दफफतन,
और सीधे बल्ले से तेरा वो घंटो पीदाना याद है..
दो-पहर की धूप में क्रिकेट खेलने के लिए,
वो तेरा छत पे नंगे पाँव आना याद है ..
जान कर झूठी अपील कर के चिल्लाना मेरा,
और तेरा ठुकरा के सर वो मुस्कुराना याद है..
घर की नज़रो से बचाकर सब की मर्ज़ी के खिलाफ,
वो मेरा छत पे लटकता बल्ब तोड़ आना याद है..
आ गया गर सचिन का कही भी ज़िक्र-ए-फिराक़,
वो मेरा हर 1 पुराना 100 गिनाना याद है..
बेरूख़ी के साथ पीदाना घंटो मुझे ,
और फिर एक नए बहाने से तेरा ,
वो घर को जाना याद है ..
अंधेरे से टकरा के थमती हसरते मेरी,
और तेरा छत को हेलोजन से जगाना याद है ..
पत्थर से टकरा कर स्विंग करना मेरा,
और तेरा फिरकी के जैसे गैन्दे घुमाना याद है..
बेख़ौफ़ भेधडक़ हो के तेरा ,
वो कही भी मॅच लगाना याद है..
जान की बाजी लगा खेला हुआ हर मॅच,
आज तक अहदे-ए-रोमांच का वो फ़साना याद है..
जब सिवा क्रिकेट के मेरा कोइ खेला ना था,
सच कहो क्या तुम को भी वो जमाना याद है
- अभिषेक दुबे